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  आरती संग्रह
  आरती - पंच परमेष्ठी
  आरती - श्रीजिनराज की
  आरती - चौबीस भगवान
  आरती - भगवान श्रीआदिनाथ जी
  आरती - श्रीचन्द्र प्रभु जी
  आरती - श्रीमुनिसुव्रतनाथ जी की
  आरती - श्रीपार्श्वनाथ जी की
  आरती - श्रीवर्द्धमान जी की
  आरती - श्रीचाँदनपुर महावीर स्वामी
  आरती - श्रीमहावीर स्वामी

    
 
   आरती - पंच परमेष्ठी
इह-विधि मंगल आरति कीजै, पंच परमपद भज सुख लीजै | टेक
पहली आरति श्रीजिनराजा, भव-दधि पार उतार जिहाजा | इह0
दूसरी आरति सिद्धन केरी, सुमिरन करत मिटै भव फेरी | इह0
तीजी आरति सूर मुनिंदा, जनम-मरन दुख दूर करिंदा | इह0
चौथी आरति श्रीउवझाया, दर्शन देखत पाप पलाया | इह0
पांचमी आरति साधु तिहांरी, कुमति-विनाशन शिवअधिकारी | इह0
छट्ठी ग्यारह प्रतिमा धारी, श्रावक वन्दौं आनंदकारी | इह0
सातमि आरति श्रीजिनवानी, ; 'द्यानत' सुरग-मुकति सुखदानी | इह0

               
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  आरती श्रीजिनराज की
आरति श्रीजिनराज तिहांरी, करमदलन संतन हितकारी | टेक
सुर-नर-असुर करत तुम सेवा, तुमही सब देवन के देवा | आरती0
पंच महाव्रत दुद्धर धारे, राग रोष परिणाम विदारे | आरती0
भव-भय-भीत शरन जे आये, ते परमारथ-पंथ लगाये | आरती0
जो तुम नाम जपै मनमांही, जनम-मरन-भय ताको नाहीं | आरती0
समवसरन-संपूरन शोभा, जीते क्रोध-मान छल लोभा | आरती0
तुम गुण हम कैसे करि गावैं, गणधर कहत पार नहिं पावैं | आरती0
करुणासागर करुणा कीजे, 'द्यानत' सेवक को सुख दीजे | आरती0

                
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आरती चौबीस भगवान
ऋषभ अजित संभव अभिनन्दन, सुमति पद्म सुपार्श्व की जय-2
महाराज की श्रीजिनराज की, दीनदयालकी आरती की जय |
चन्द्र पुष्प शीतल श्रेयांस, वासुपूज्य महाराज की जय-2
महाराज की श्रीजिनराज की, दीनदयाल की आरती की जय |
विमल अनन्त धर्म जस उज्ज्वल, शांतिनाथ महाराज की जय-2
महाराज की श्रीजिनराज की, दीनदयाल की आरती की जय |
कुन्थअरह और मल्लि मुनिसुव्रत, नमिनाथ महाराज की जय-2
महाराज की श्रीजिनराज की, दीनदयाल की आरती की जय |
नेमिनाथ प्रभु पार्श्व जिनेश्वर, वर्धमान महाराज की जय-2
महाराज की श्रीजिनराज की, दीनदयाल की आरती की जय |
इन चौबीसों की आरती करके, आवागमन निवार की जय-2
महाराज की श्रीजिनराज की, दीनदयाल की आरती की जय |
           
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  आरती भगवान श्रीआदिनाथ जी
जगमग जगमग आरती कीजै, आदिश्वर भगवान की |
प्रथम देव अवतारी प्यारे, तीर्थंकर गुणवान की | जगमग0
अवधपुरी में जन्मे स्वामी, राजकुंवर वो प्यारे थे,
मरु माता बलिहार हुई, जगती के तुम उजियारे थे,
द्वार द्वार बजी बधाई, जय हो दयानिधान की ||  जगमग0
बड़े हुए तुम राजा बन गये, अवधपुरी हरषाई थी, 2
भरत-बाहुबली सुत मतवारे मंगल बेला आई ; थी, 2
करें सभी मिल जय जयकारे, भारत पूत महान की | जगमग0
नश्वरता को देख प्रभुजी, तुमने दीक्षा धारी थी, 2
देख तपस्या नाथ तुम्हारी, यह धरती बलिहारी थी |
प्रथम देव तीर्थंकर की जय, महाबली बलवान की|| जगमग0
बारापाटी में तुम प्रकटे, चादंखेड़ी मन भाई है,
जगह-जगह के आवे यात्री, चरणन शीश झुकाई है |
फैल रही जगती में "नमजी" महिमा उसके ध्यान की||जगमग0

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आरती - श्रीचन्द्र प्रभु जी
म्हारा चन्द्र प्रभु जी की सुन्दर मूरत, म्हारे मन भाई जी || टेक
सावन सुदि दशमी तिथि आई, प्रगटे त्रिभुवन राईजी ||
अलवर प्रांत में नगर तिजारा, दरशे देहरे मांही जी ||
सीता सती ने तुमको ध्याया, अग्नि में कमल रचायाजी ||
मैना सती ने तुमको ध्याया, पति का कुष्ट मिटाया जी ||
जिनमें भूत प्रेत नित आते, उनका साथ छुड़ाया जी ||
सोमा सती ने तुमको ध्याया, नाग का हार बनाया जी ||
मानतुंग मुनि तुमको ध्याया, तालों को तोड़ भगाया जी ||
जो भी दुखिया दर पर आया उसका कष्ट मिटाया जी ||
अंजन चोर ने तुमको ध्याया, शस्त्रों से अधर उठाया जी ||
सेठ सुदर्शन तुमको ध्याया, सूली का सिंहासन बनाया जी ||
समवशरण में जो कोई आया, उसको पार लगाया जी || 
रत्न जड़ित सिंहासन सोहे, ता में अधर विराजे जी ||
तीन छत्र शीष पर सोहें, चौंसठ चंवर ढुरावें जी || 
ठाड़ो सेवक अर्ज करै छै, जनम मरण मिटाओ जी ||
भक्त तुम्हारे तुमको ध्यावैं बेड़ा पार लगाओ जी ||

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आरती - श्रीमुनिसुव्रतनाथ जी की
     
(चालः- ओम् जय सन्मति देवा.....)
ऊँ जय मुनिसुव्रतस्वामी, प्रभु जय मुनिसुव्रतस्वामी |
भक्ति भाव से प्रणमूं, जय अंतरयामी || ऊँ जय0
राजगृही में जन्म लिया प्रभु, आनन्द भयो भारी |
सुर नर-मुनि गुण गाएँ, आरती कर थारी || ऊँ जय0
पिता तिहारे, सुमित्र राजा, शामा के जाया |
श्यामवर्ण मूरत तेरी, पैठण में अतिशय दर्शाया ||ऊँ जय0
जो ध्यावे सुख& पावे, सब संकट दूर करें |
मन वांछित फल पावे, जो प्रभु चरण धरें || ऊँ जय0
जन्म मरण, दुख हरो प्रभु, सब पाप मिटे मेरे |
ऐसी कृपा करो प्रभु, हम दास रहें तेरे || ऊँ जय0
निजगुण ज्ञान का, दीपक ले आरती करुं थारी |
सम्यग्ज्ञान दो सबको, जय त्रिभुवन के स्वामी || ऊँ जय0
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 आरती - श्रीपार्श्वनाथ जी की
ऊँ जय पारस देवा स्वामी जय पारस देवा |
सुर नर मुनिजन तुम चरणन की करते नित सेवा | ऊँ जय0
पौष वदी ग्यारस काशी में आनन्द अति भारी, स्वामी आनन्द0
अश्वसेन वामा माता उर लीनों अवतारी || ऊँ जय0
श्याम वरण नवहस्त काय पग-उरग लखन सोहैं, स्वामी उरग0
सुरकृत अति अनुपम पा भूषण सबका मन मोहैं || ऊँ जय0
जलते देख नाग-नागिन को मंत्र नवकार दिया, स्वामी मंत्र0
हरा कमठ का मान ज्ञान का भानु प्रकाश किया | ऊँ जय0
मात पिता तुम स्वामी मेरे, आस करुं किसकी, स्वामी आस0
तुम बिन दाता और न कोई शरण गहूं जिसकी || ऊँ जय0
तुम परमातम तुम अध्यातम तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम0
स्वर्ग मोक्ष के दाता तुम हो त्रिभुवन के स्वामी || ऊँ जय0
दीनबन्धु दुःख हरण जिनेश्वर, तुमही हो मेरे, स्वामी तुम0
दो शिवधाम को वास दास, हम द्वार खड़े तेरे || ऊँ जय0
विपद विकार मिटाओ मन का, अर्ज सुनो दाता, स्वामी अर्ज सुनो दाता |
सेवक द्वै कर जोड़ प्रभु के चरणो चित लाता || ऊँ जय0

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 आरती - श्रीवर्द्धमान जी की
करौं आरती वर्द्धमानकी | पावापुर निरवान थान की टेक
राग - बिना सब जगजन तारे | द्वेष बिना सब कर्म विदारे |
शील-धुरंधर शिव-तिय भोगी | मनवच-कायन कहिये योगी | करौं0
रत्नत्रय निधि परिग्रह-हारी | ज्ञानसुधा भोजनव्रतधारी | करौं0
लोक अलोक व्यापै निजमांहीं | सुखमय इंद्रिय सुखदुख नाहीं | करौं0
पंचकल्याणकपूज्य विरागी | विमल दिगंबर अबंर-त्यागी | करौं0
गुनमनि-भूषन भूषित स्वामी | जगत उदास जगंतर स्वामी | करौं0
कहै कहां लौ तुम सबजानौं | 'द्यानत' की अभिलाषा प्रमानौ | करौं0
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 आरती - श्रीचाँदनपुर महावीर स्वामी
जय महावीर प्रभो, स्वामी जय महावीर प्रभो |
कुण्डलपुर अवतारी, त्रिशलानन्द विभो ||
                                     ऊँ जय महावीर प्रभो ||
सिद्धारथ घर जन्मे, वैभव था भारी, स्वामी वैभव था भारी |
बाल ब्रह्मचारी व्रत पाल्यौ तपधारी |1| ऊँ जय म0 प्रभो |
आतम ज्ञान विरागी, सम दृष्टि धारी |
माया मोह विनाशक, ज्ञान ज्योति जारी |2| ऊँ जय म0 प्रभो |
जग में पाठ अहिंसा, आपहि विस्तार्यो |
हिंसा पाप मिटाकर, सुधर्म परिचार्यो |3| ऊँ जय म0 प्रभो |
इह विधि चाँदनपुर में, अतिशय दरशायो |
ग्वाल मनोरथ पुर्यो दूध गाय पायो |4| ऊँ जय म0 प्रभो |
अमर चन्द को सपना, तुमने प्रभु दीना |
मन्दिर तीन शिखर का निर्मित है कीना|5| ऊँ जय म0 प्रभो |
जयपुर नृप भी तेरे, अतिशय के सेवी |
एक ग्राम तिन दीनों, सेवा हित यह भी |6| ऊँ जय म0 प्रभो |
जो कोई तेरे दर पर, इच्छा कर आवे |
होय मनोरथ पूरण, संकट मिट जावे |7| ऊँ जय म0 प्रभो |
निशि दिन प्रभु मन्दिर में, जगमग ज्योति जरै |
हम सेवक चरणों में, आनन्द मोद भरै |8| ऊँ जय म0 प्रभो |

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आरती - श्रीमहावीर स्वामी
जय सन्मति देवा, प्रभु जय सन्मति देवा |
वर्द्धमान महावीर वीर अति, जय संकट छेवा || टेक
सिद्धारथ नृप नन्द दुलारे, त्रिशला के जाये |
कुण्डलपुर अवतार लिया, प्रभु सुर नर हर्षाये || ऊँ जय0
देव इन्द्र जन्माभिषेक कर, उर प्रमोद भरिया |
रुप आपका लख नहिं पाये, सहस आंख धरिया ||ऊँ जय0
जल में भिन्न कमल ज्यों रहिये, घर में बाल यती |
राजपाट ऐश्वर्य छाँड सब, ममता मोह हती || ऊँ जय0
बारह वर्ष छद्मावस्था में, आतम ध्यान किया |
घाति-कर्म चकचूर, चूर प्रभु केवल ज्ञान लिया || ऊँ जय0
पावापुर के बीच सरोवर, आकर योग कसे |
हने अघातिया कर्म शत्रु सब, शिवपुर जाय बसे ||ऊँ जय0
भूमंडल के चांदनपुर में, मंदिर मध्य लसे |
शान्त जिनेश्वर मूर्ति आपकी, दर्शन पाप नसे || ऊँ जय0
करुणासागर करुणा कीजे, आकर शरण गही ||
दीन दयाला जगप्रतिपाला, आनन्द भरण तुही || ऊँ जय
 
   

      
       
 
भगवान श्रीआदिनाथ 
  

 

 

 

 


  
                

 
श्रीचन्द्र प्रभु
   
  

 

 

 


     
              
  
श्रीमुनिसुव्रतनाथ 

 

 

 


 
                 
 
श्रीपार्श्वनाथ

 


    
  
                    
  
श्रीमहावीर स्वामी

 

 

 



      Tirthankara


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                                                                         

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