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            The 18th Jain Tirthankara Shri Aranath
  श्रीअरहनाथ जिन पूजा
   Fish
  (चिह्न मछली)
         (छप्पय छंद, वीर रस, रुपकालंकार)
तप तुरंग असवार धार, तारन विवेक कर |
ध्यान शुकल असिधार शुद्ध सुविचार सुबखतर ||
भावन सेना, धर्म दशों सेनापति थापे |
रतन तीन धरि सकति, मंत्रि अनुभो निरमापे ||
सत्तातल सोहं सुभटि धुनि, त्याग केतु शत अग्र धरि |
इहविध समाज सज राज को, अर जिन जीते कर्म अरि ||
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् |
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् |
                                  अष्टक
      छंद त्रिभंगी अनुप्रयासक (मात्रा 32, जगणवर्जित)
कनमनिमय झारी, दृग सुखकारी, सुर सरितारी नीर भरी |
मुनिमन सम उज्ज्वल, जनम जरादल, सो ले पदतल धार करी ||
प्रभु दीन दयालं, अरिकुल कालं, विरद विशालं सुकुमालं |
हरि मम जंजालं, हे जगपालं, अरगुन मालं, वरभालं ||
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1|
भवताप नशावन, विरद सुपावन, सुनि मन भावन, मोद भयो |
तातैं घसि बावन, चंदनपावन, तुमहिं चढ़ावन, उमगि अयो ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2|
तंदुल अनियारे, श्वेत सँवारे, शशिदुति टारे, थार भरे |
पद अखय सुदाता, जगविख्याता, लखि भवत्राता पुंजधरे ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि0स्वाहा |3|
सुरतरु के शोभित, सुरन मनोभित, सुमन अछोभित ले आयो |
मनमथ के छेदन, आप अवेदन, लखि निरवेदन गुन गायो ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि0स्वाहा |4|
नेवज सज भक्षक प्रासुक अक्षक, पक्षक रक्षक स्वक्ष धरी |
तुम करम निकक्षक, भस्म कलक्षक, दक्षक पक्षक रक्ष करी ||
प्रभु दीन दयालं, अरिकुल कालं, विरद विशालं सुकुमालं |
हरि मम जंजालं, हे जगपालं, अरगुन मालं, वरभालं ||
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं नि0स्वाहा |5|
तुम भ्रमतम भंजन मुनिमन कंजन, रंजन गंजन मोह निशा
रवि केवलस्वामी दीप जगामी, तुम ढिग आमी पुण्य दृशा ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6|
दशधूप सुरंगी गंध अभंगी वह्वि वरंगी माहिं हवें |
वसुकर्म जरावें धूम उड़ावें, ताँडव भावें नृत्य पवें ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7|
रितुफल अतिपावन, नयन सुहावन, रसना भावन, कर लीने |
तुम विघन विदारक, शिवफलकारक, भवदधि तारक चरचीने ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8|
सुचि स्वच्छ पटीरं, गंधगहीरं, तंदुलशीरं, पुष्प-चरुं |
वर दीपं धूपं, आनंदरुपं, ले फल भूपं, अर्घ करुं ||प्रभु0
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि0स्वाहा |9|
                       पंच कल्याणक अर्घ्यावली
                           छंद चौपाई (मात्रा 16)
फागुन सुदी तीज सुखदाई, गरभ सुमंगल ता दिन पाई |
मित्रादेवी उदर सु आये, जजे इन्द्र हम पूजन आये ||
ॐ ह्रीं फाल्गुनशुक्ला तृतीयायां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |1|
मँगसिर शुक्ल चतुर्दशि सोहे, गजपुर जनम भयो जग मोहे |
सुर गुरु जजे मेरु पर जाई, हम इत पूजें मनवचकाई ||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्ला चतुर्दश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |2|
मंगसिर सित दसमी दिन राजे, ता दिन संजम धरे विराजै |
अपराजित घर भोजन पाई, हम पूजें इत चित हरषाई ||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्ला दशम्यां तपोमंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |3|
कार्तिक सित द्वादशि अरि चूरे, केवलज्ञान भयो गुन पूरे |
समवसरन तिथि धरम बखाने, जजत चरन हम पातक भाने ||
ॐ ह्रीं कार्तिकशुक्ला द्वादश्यां ज्ञानमंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |4|
चैत कृष्ण अमावसी सब कर्म, नाशि वास किय शिव-थल पर्म |
निहचल गुन अनंत भंडारी, जजौं देव सुधि लेहु हमारी ||
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णाअमावस्यायां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीअर0अर्घ्यं नि0 |5|
                                     जयमाला
             दोहा छन्द - जमकपद तथा लाटानुबंधन
बाहर भीतर के जिते, जाहर अर दुखदाय |
ता हर कर अर जिन भये, साहर शिवपुर राय |1|
राय सुदरशन जासु पितु, मित्रादेवी माय |
हेमवरन तन वरष वर, नव्वै सहस सुआय |2|
                     
(छन्द तोटक वर्ण 12)
जय श्रीधर श्रीकर श्रीपति जी, जय श्रीवर श्रीभर श्रीमति जी |
भवभीम भवोदधि तारन हैं, अरनाथ नमों सुखकारन हैं |3|
गरभादिक मंगल सार धरे, जग जीवनि के दुखदंद हरे |
कुरुवंश शिखामनि तारन हैं, अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |4|
करि राज छखंड विभूति मई, तप धारत केवलबोध ठई |
गण तीस जहाँ भ्रमवारन हैं, अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |5|
भविजीवन को उपदेश दियो, शिवहेत सबै जन धारि लियो |
जग के सब संकट टारन हैं, अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |6|
कहि बीस प्ररुपन सार तहाँ, निजशर्म सुधारस धार जहाँ |
गति चार ह्रषीपन धारन हैं, अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |7|
षट काय तिजोग तिवेद मथा, पनवीस कषा वसु ज्ञान तथा |
सुर संजम भेद पसारन हैं, अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |8|
रस दर्शन लेश्या भव्य जुगं, षट सम्यक् सैनिय भेद युगं |
जुग हारा तथा सु अहारन हैं, अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |9|
गुनथान चतुर्दस मारगना, उपयोग दुवादश भेद भना |
इमि बीस विभेद उचारन हैं, अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |10|
इन आदि समस्त बखान कियो, भवि जीवनि ने उर धार लियो |
कितने शिववादिन धारन हैं, अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |11|
फिर आप अघाति विनाश सबै, शिवधाम विषैं थित कीन तबै |
कृतकृत्य प्रभू जगतारन हैं अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |12|
अब दीनदयाल दया धरिये, मम कर्म कलंक सबै हरिये |
तुमरे गुन को कछु पार न है, अरनाथ नमौं सुखकारन हैं |13|
               घत्तानन्द छन्द (मात्रा 31)
जय श्रीअरदेवं, सुरकृतसेवं समताभेवं, दातारं |
अरिकर्म विदारन, शिवसुखकारन, जयजिनवर जग त्रातारं ||
ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथजिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
अर जिन के पदसारं, जो पूजै द्रव्य भाव सों प्राणी |
सो पावै भवपारं, अजरामर मोक्षथान सुखखानी ||
             इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
                                                                                         

                                                                        (Hindi Version)

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