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                    Jain sixth Tirthanakara
        श्रीपद्मप्रभ जिन पूजा
         
    (चिह्न : कमल)
      छंद रोड़क (मदावलिप्तकपोल)
पदम-राग-मनि-वरन-धरन, तनतुंग अढ़ाई |
शतक दंड अघखंड, सकल सुर सेवत आई ||
धरनि तात विख्यात सु सीमाजू के नंदन |
पदम चरन धरि राग सुथापौं इत करि वंदन ||
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्र ! अत्रावतर अवतर संवौषट् |
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् |
                               अष्टक
             चाल होली की, ताल जत्त
पूजौं भाव सों, श्री पदमनाथपद सार, पूजौं भाव सों | टेक |
गंगाजल अति प्रासुक लीनों, सौरभ सकल मिलाय |
मन वचन तन त्रयधार देत ही, जनम-जरा-मृतु जाय |
पूजौं भाव सों, श्री पदमनाथ पद-सार, पूजौं भाव सों ||
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1|

मलयागिर कपूर चंदन घसि, केशर रंग मिलाय |
भवतपहरन चरन पर वारौं, मिथ्याताप मिटाय |पूजौं0
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2|
तंदुल उज्ज्वल गंध अनी जुत, कनक थार भर लाय |
पुंज धरौं तुव चरनन आगे, मोहि अखयपद दाय |पूजौं0
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि0स्वाहा |3|
पारिजात मदार कल्पतरु-जनित, सुमन शुचि लाय |
समरशूल निरमूल-करनकों, तुम पद पद्म चढ़ाय | पूजौ0
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि0स्वाहा |4|
घेवर बावर आदि मनोहर, सद्य सजे शुचि लाय |
क्षुधा रोग निर्वारन कारन, जजौं हरष उर लाय |पूजौं0
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं नि0स्वाहा |5|
दीपक ज्योति जगाय ललित वर, धूम रहित अभिराम |
तिमिर मोह नाशन के कारन, जजौं चरन गुनधाम |पूजौं0
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6|
कृष्णागर मलयगिर चंदन, चूर सुगंध बनाय |
अगनि माहिं जारौं तुम आगे, अष्टकर्म जरि जाय |पूजौं0
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7|
सुरस-वरन रसना मन भावन, पावन फल अधिकार |
ता सों पूजौं जुगम चरन यह, विघम करम निरवार |पूजौं0
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8|
जल फल आदि मिलाय गाय गुन, भगति भाव उमगाय |
जजौं तुमहिं शिवतिय वर जिनवर, आवागमन मिटाय |पूजौं0
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि0स्वाहा |9|
                          पंच कल्याणक अर्घ्यावली
           छंद द्रुतविलंबिता तथा सुन्दरी (मात्रा 16)
असित माघ सु छट्ट बखानिये, गरभ मंगल ता दिन मानिये |
ऊरध ग्रीवक सों चये राज जी, जजत इन्द्र जजैं हम आज भी ||
ॐ ह्रीं माघकृष्णा षष्ठीदिने गर्भ मंगल प्राप्ताय श्रीपद्मप्रभ जिनेनद्राय 
अर्घ्यं नि0स्वाहा |1|
आसित कार्तिक तेरस को जये, त्रिजग जीव सुआनंद को लये |
नगर स्वर्ग समान कुसंबिका, जजतु हैं हरिसंजुत अंबिका ||
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णा त्रयोदश्यां जन्ममंगल प्राप्ताय श्रीपद्मप्रभ जिने0 अर्घ्यं |2|
असित तेरस कार्तिक भावनी, तप धर्यो वन षष्टम पावनी |
करत आतमध्यान धुरंधरो, जजत हैं हम पाप सबै हरो ||
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णा त्रयोदश्यां तपो मंगल प्राप्ताय श्रीपद्मप्रभ जिने0 अर्घ्यं |3|
शुकल-पूनम चैत सुहावनी, परम केवल सो दिन पावनी |
सुर-सुरेश नरेश जजें तहां, हम जजें पद पंकज को इहां ||
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्ला पूर्णिमायां केवलज्ञान प्राप्ताय श्रीपद्मप्रभ जिने0 अर्घ्यं |4|
असित फागुन चौथ सुजानियो, सकलकर्म महारिपु हानियो |
गिरसमेद थकी शिव को गये, हम जजें पद ध्यानविषै लये ||
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णा चतुर्थीदिने मोक्षमंगल प्राप्ताय श्रीपद्मप्रभ जिने0 अर्घ्यं |5|
                                          जयमाला
                                        छंद घत्तानंद
जय पद्मजिनेशा शिवसद्मेशा, पाद पद्म जजि पद्मेशा |
जय भव तम भंजन, मुनिमम कंजन, रंजन को दिव साधेसा |1|
                                    छंद रुप चौपाई
जय-जय जिन भविजन हितकारी, जय जय जिन भव सागर तारी |
जय जय समवसरन धन धारी, जय जय वीतराग हितकारी |2|
जय तुम सात तत्त्व विधि भाख्यौ, जय जय नवपदार्थ लखिआख्यो |
जय षट्द्रव्य पंचजुतकाय, जय सब भेद सहित दरशाया |3|
जय गुनथान जीव परमानो, पहिले महिं अनंत-जिव जानो |
जय दूजे सासादन माहीं, तेरह कोड़ि जीव थित आहीं |4|
जय तीजे मिश्रित गुणथाने, जीव सु बावन कोड़ि प्रमाने |
जय चौथे अविरतिगुन जीवा, चार अधिक शत कोड़ि सदीवा |5|
जय जिय देशावरत में शेषा, कोड़ि सात सा है थित वेशा |
जय प्रमत्त षट्शून्य दोय वसु, नव तीन नव पांच जीवलसु |6|
जय जय अपरमत्त दुइ कोरं, लक्ष छानवै सहस बहोरं |
निन्यानवे एकशत तीना, ऐते मुनि तित रहहिं प्रवीना |7|
जय जय अष्टम में दुइ धारा, आठ शतक सत्तानों सारा |
उपशम में दुइ सौ निन्यानों, छपक माहिं तसु दूने जानों |8|
जय इतने इतने हितकारी, नवें दशें जुगश्रेणी धारी |
जय ग्यारें उपशम मगगामी, दुइ सौ निन्यानौं अधगामी |9|
जयजय छीनमोह गुनथानो, मुनि शत पांच अधिक अट्ठानों |
जय जय तेरह में अरिहंता, जुग नभपन वसु नव वसु तंता |10|
एते राजतु हैं चतुरानन, हम वंदें पद थुतिकरि आनन |
हैं अजोग गुन में जे देवा, मन सों ठानों करों सुसेवा |11|
तित तिथि अ इ उ ऋ लृ भाषत, करिथित फिर शिव आनंद चाखत |
ऐ उतकृष्ट सकल गुनथानी, तथा जघन मध्यम जे प्रानी |12|
तीनों लोक सदन के वासी, निजगुन परज भेदमय राशी |
तथा और द्रव्यन के जेते, गुन परजाय भेद हैं तेते |13|
तीनों कालतने जु अनंता, सो तुम जानत जुगपत संता |
सोई दिव्य वचन के द्वारे, दे उपदेश भविक उद्धारे |14|
फेरी अचल थल बासा कीनो, गुन अनंत निजआनंद भीनो |
चरम देह तें किंचित ऊनो, नर आकृति तित ह्वै नित गूनो |15|
जय जय सिद्धदेव हितकारी, बार बार यह अरज हमारी |
मोकों दुखसागर तें काढ़ो, 'वृन्दावन' जांचतु है ठाड़ो |16|
                                    छंद घत्ता
जय जय जिनचंदा पद्मानंदा, परम सुमति पद्माधारी |
जय जनहितकारी दयाविचारी, जय जय जिनवर अविकारी ||
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
                                   छन्द रोड़क
जजत पद्म पद पद्म सद्म ताके सुपद्म अत |
होत वृद्धि सुत मित्र सकल आनंदकंद शत ||
लहत स्वर्गपदराज, तहाँ तें चय इत आई |
चक्री को सुख भोगि, अंत शिवराज कराई ||
               इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
               
                                                                                         

                                                                        (Hindi Version)

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