होम

 जैन धर्म 

 तीर्थकरों 

 जैन साहित्य     

जैन आचार्य

जैन पर्व

 जैन तीर्थ

  होम(Home) >  
जैन पर्व >


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

              The seventh Jain Tirthankara
 श्रीसुपार्श्वनाथ जिन पूजा
      Swastik symbol
 (चिन्ह - साँथिया)
           (छन्द हरिगीता तथा गीता)
जय जय जिनिंद गनिंद इन्द, नरिंद गुन चिंतन करें |
तन हरीहर मनसम हरत मन, लखत उर आनन्द भरें ||
नृप सुपरतिष्ठ वरिष्ठ इष्ट, महिष्ठ शिष्ट पृथी प्रिया |
तिन नन्दके पद वन्द वृन्द, अमंद थापत जुतक्रिया ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् |
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् |
     
(चाल द्यानतरायजीकृत सोलहकारण भाषाष्टक की)
उज्ज्वल जल शुचि गंध मिलाय, कंचनझारी भरकर लाय |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||
तुम पद पूजौं मनवचकाय, देव सुपारस शिवपुरराय |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1|
मलयागिर चंदन घसि सार, लीनो भवतप भंजनहार |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||तुम0
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2|
देवजीर सुखदास अखंड, उज्ज्वल जलछालित सित मंड |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||तुम0
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् नि0स्वाहा |3|
प्रासुक सुमन सुगंधित सार, गुंजत अलि मकरध्वजहार |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||तुम0
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं नि0स्वाहा |4|
छुधाहरण नेवज वर लाय, हरौं वेदनी तुम्हें चढ़ाय |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||तुम0
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं नि0स्वाहा |5|
ज्वलित दीप भरकरि नवनीत, तुम ढिग धारतु हौं जगमीत |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||तुम0
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6|
दशविधि गन्ध हुताशन माहिं, खेवत क्रूर करम जरि जाहिं |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||
तुम पद पूजौं मनवचकाय, देव सुपारस शिवपुरराय |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7|
श्रीफल केला आदि अनूप, ले तुम अग्र धरौं शिवभूप |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||तुम0
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8|
आठों दरब साजि गुनगाय, नाचत राचत भगति बढ़ाय |
दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो ||तुम0
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि0स्वाहा |9|
                        पंच कल्याणक अर्घ्यावली
          
  छंद द्रुतविलंबित तथा सुन्दरी (मात्रा 12)
सुकल भादव छट्ठ सु जानिये, गरभ मंगल ता दिन मानिये |
करत सेव शची रचि मात की, अरघ लेय जजौं वसु भांत की ||
ॐ ह्रीं भाद्रपदशुक्लाषष्ठीदिने गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीसुपार्श्व0 अर्घ्यं नि0 |1|
सुकल जेठ दुवादशि जन्मये, सकल जीव सु आनन्द तन्मये |
त्रिदशराज जजें गिरिराजजी, हम जजें पद मंगल साजजी ||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्लाद्वादश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीसुपार्श्व0 अर्घ्यं नि0 |2|
जनम के तिथि पे श्रीधर ने धरी, तप समस्त प्रमादन को हरी |
नृप महेन्द्र दियो पय भाव सौं, हम जजें इत श्रीपद चाव सों ||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्लाद्वादश्यां तपोमंगलप्राप्ताय श्रीसुपार्श्व0 अर्घ्यं नि0 |3|
भ्रमर फागुन छट्ठ सुहावनो, परम केवलज्ञान लहावनो |
समवसर्न विषैं वृष भाखियो, हम जजें पद आनन्द चाखनो ||
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णा षष्ठीदिने केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीसुपार्श्व0 अर्घ्यं नि0 |4|
असित फागुन सातय पावनो, सकल कर्म कियो छय भावनो |
गिरि समेदथकी शिव जातु हैं, जजत ही सब विघ्न विलातु हैं ||
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णा सप्तमीदिने मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीसुपार्श्व0 अर्घ्यं नि0 |5|
                                         जयमाला
दोहाः-
तुंग अंग धनु दोय सौ, शोभा सागरचन्द |
          मिथ्यातपहर सुगुनकर, जय सुपास सुखकंद |1|
                       
छन्द कामिनी मोहन (10 मात्रा)
जयति जिनराज शिवराज हितहेत हो | 
परम वैराग आनन्द भरि देत हो || 
गर्भ के पूर्व षट्मास धनदेव ने |
नगर निरमापि वाराणसी सेव में |2| 
गगन सों रतन की धार बहु वरषहीं |
कोड़ि त्रैअर्द्ध त्रैवार सब हरषहीं ||
तात के सदन गुनवदन रचना रची |
मातु की सर्वविधि करत सेवा शची |3|
भयो जब जनम तब इन्द्र-आसन चल्यो |
होय चकित तब तुरित अवधितैं लखि भल्यो ||
सप्त पग जाय शिर नाय वन्दन करी |
चलन उमग्यो तबै मानि धनि धनि घरी |4| 
सात विधि सैन गज वृषभ रथ बाज ले |
गन्धरव नृत्यकारी सबै साज ले ||
गलित मद गण्ड ऐरावती साजियो |
लच्छ जोजन सुतन वदन सत राजियो |5|
वदन वसुदन्त प्रतिदन्त सरवर भरे |
ता सु मधि शतक पनबीस कमलिनि खरे ||
कमलिनी मध्य पनवीस फूले कमल |
कमल-प्रति-कमल मँह एक सौ आठ दल |6| 
सर्वदल कोड़ शतबीस परमान जू |
ता सु पर अपछरा नचहिं जुतमान जू ||
तततता तततता विततता ताथई |
धृगतता धृगतता धृगतता में लई |7|
धरत पग सनन नन सनन नन गगन में |
नूपुरे झनन नन झनन नन पगन में ||
नचत इत्यादि कई भाँति सों मगन में |
केई तित बजत बाजे मधुर पगन में |8| 
केई दृम दृम दुदृम दृम मृदंगनि धुनै |
केई झल्लरि झनन झंझनन झंझनै ||
केई संसाग्रते सारंगि संसाग्र सुर |
केई बीना पटह बंसि बाजें मधुर |9|
केई तनतन तनन तनन ताने पुरैं |
शुद्ध उच्चारि सुर केई पाठैं फुरैं ||
केइ झुकि झुकि फिरे चक्र सी भामिनी |
धृगगतां धृगगतां पर्म शोभा बनी |10| 
केई छिन निकट छिन दूर छिन थूल-लघु |
धरत वैक्रियक परभाव सों तन सुभगु ||
केई करताल-करताल तल में धुनें |
तत वितत घन सुषिरि जात बाजें मुनै |11|
इन्द्र आदिक सकल साज संग धारिके |
आय पुर तीन फेरी करी प्यार तें ||
सचिय तब जाय परसूतथल मोद में |
मातु करि नींद लीनों तुम्हें गोद में |12| 
आन-गिरवान नाथहिं दियो हाथ में |
छत्र अर चमर वर हरि करत माथ में ||
चढ़े गजराज जिनराज गुन जापियो |
जाय गिरिराज पांडुक शिला थापियो |13|
लेय पंचम उदधि-उदक कर कर सुरनि |
सुरन कलशनि भरे सहित चर्चित पुरनि ||
सहस अरु आठ शिर कलश ढारें जबै |
अघघ घघ घघघ घघ भभभ भभ भौ तबै |14| 
धधध धध धधध धध धुनि मधुर होत है |
भव्य जन हंस के हरस उद्योत है ||
भयो इमि न्हौन तब सकल गुन रंग में |
पोंछि श्रृंगार कीनों शची अंग में |15|
आनि पितुसदन शिशु सौंपि हरि थल गयो |
बाल वय तरुन लहि राज सुख भोगियो ||
भोग तज जोग गहि, चार अरि कों हने |
धारि केवल परम धरम दुइ विध भने |16| 
नाशि अरि शेष शिवथान वासी भये |
ज्ञानदृग अरि शेष शिवथान वासी भये |
दीन जन की करुण सुन लीजिये |
धरम के नन्द को पार अब कीजिये |17|
घर्त्ताः- जय करुनाधारी, शिवहितकारी तारन तरन जिहाजा हो |
          सेवत नित वन्दे मनआंनदे, भवभय मेटनकाजा हो |18| 
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
दोहाः- श्री सुपार्श्व पदजुगल जो जजें पढ़े यह पाठ |
          अनुमोदें सो चतुर नर पावें आनन्द ठाठ ||
                इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
           
                                                                                         

                                                                        (Hindi Version)

                                         Site copyright ã 2004, jaindharmonline.com All Rights Reserved                  

                                                             Best viewed at 800 x 600 screen size