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 कृत्रिम-अकृत्रिम चैत्यालयों की वन्दना

  कृत्रिम-अकृत्रिम चैत्यालयों की वन्दना

    कृत्याकृत्रिम-चारु-चैत्य-निलयान् नित्यं त्रिलोकी-गतान्,
    वंदे भावन-व्यंतर-द्युतिवरान् स्वर्गामरावासगान् |
    सद्गंधाक्षत-पुष्प-दाम-चरुकैः सद्दीपधूपैः फलैर,
    नीराद्यैश्च यजे प्रणम्य शिरसा दुष्कर्मणां शांतये ||
अर्थ- तीनों लोकों संबधी सुन्दर कृत्रिम (मनुष्य, देव द्वारा निर्मित) व अकृत्रिम (अनादिऽनिधन-जो किसी के द्वारा बनाये नहीं हैं)  चैत्यालयों (मंदिरों) को तथा भवनवासी, व्यंतर,  ज्योतिषि, कल्पवासी  देवों के भवनों,   विमानों में स्थित अकृत्रिम चैत्यालयों को नमस्कार कर दुष्ट कर्मों की शान्ति के लिए पवित्र  जल, गन्ध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप तथा फल के द्वारा उनकी पूजा करता  हूँ  |1|
ॐ ह्रीं त्रिलोक सम्बन्धि कृत्रिमाकृत्रिम-चैत्यालयेभ्यः अर्घ्यं निर्व0 स्वाहा

    वर्षेषु-वर्षान्तर-पर्वतेषु नंदीश्वरे यानि च मंदरेषु |
    यावंति चैत्यायतनानि लोके सर्वाणि वंदे जिनपुंगवानां ||
अर्थ- जम्बू द्वीपवर्ती भरत, हेमवत् आदि क्षेत्रों में धातकी द्वीप एवं पुष्करार्द्ध  द्वीप संबधी   क्षेत्रों में सर्व कुलाचलों, पंच मेरु संबंधी, नंदीश्वर आदि समस्त  द्वीप स्थित चैत्यालयों   में स्थित   लोक   की समस्त जिन प्रतिमाओं की  वंदना करता हूँ  |2| 

    अवनि - तल - गतानां कृत्रिमाकृत्रिमाणां,
वन - भवन - गतानां दिव्य - वैमानिकानां |
इह मनुज - कृतानां देवराजार्चितानां,
जिनवर - निलयानां भावतोऽहं स्मरामि ||
अर्थ- पृथ्वी के नीचे (पाताल में) व्यन्तर देवों के, (ज्योतिष देवों के), भवन वासी देवों के भवनों में, एवं   (कल्पवासी देवों के) दिव्य विमानों में स्थित कृत्रिम और अकृत्रिम चैत्यालयों तथा इस  मध्य लोक में मनुष्यों द्वारा बनाये गये, इन्द्रों द्वारा पूजित चैत्यालयों का भावपूर्वक स्मरण करता हूँ |3| 

    जंबू-धातकि-पुष्करार्द्ध-वसुधा-क्षेत्र त्रये ये भवाः,
    चन्द्रांभोज-शिखंडि-कण्ठ-कनक-प्रावृगंघनाभा जिनाः |
    सम्यग्ज्ञान-चरित्र-लक्षण-धरा दग्धाष्टकर्मेन्धनाः |
    भूतानागत-वर्तमान-समये तेभ्यो-जिनेभ्यो-नमः ||
अर्थ - जम्बु  द्वीप, धातकी द्वीप और पुष्करार्द्ध इन अढ़ाई द्वीपों के भरत, ऐरावत और विदेह इन तीन क्षेत्रों में, चन्द्रमा के समान श्वेत, कमल के समान लाल, मोर के कंठ के  समान निले तथा स्वर्ण के समान पीले रंग पन्ना के समान हरे और मेघ के समान कृष्ण वर्ण वाले, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र के धारी और अष्ट कर्म रुपी ईंधन को  जला चुके भूतकालीन भविष्यकालीन और वर्तमान-कालीन जितने तीर्थंकर हैं उन सबको नमस्कार हैं |4|  

    श्रीमन् मेरौ कुलाद्रौ रजत-गिरिवरे शाल्मलौ जंबूवृक्षे,
वक्षारे चैत्यवृक्षे रतिकरे रुचिके कुंडले मानुषांके |
    इष्वाकारेऽन्जनाद्रौ दधि-मुख-शिखरे व्यन्तरे स्वर्गलोके,
    ज्योतिर्लोकेऽभिवंदे भुवने महितले यानि चैत्यालयानि ||
अर्थ - शोभा संयुक्त सुमेरु पर्वतों पर, कुलाचल पर्वतों पर, विजयार्द्ध पर्वतों पर, शाल्मली और जम्बुवृक्ष पर, वक्षार पर्वतों पर, चैत्य वृक्षों पर, रतिकर पर्वतों पर, कुण्डल गिर पर्वत पर, मानुषोत्तर पर्वत पर, इष्वाकार गिरि पर्वतों पर अंजन गिर पर्वतों पर, दधिमुख पर्वतों पर, व्यन्तर, वैमानिक, ज्योतिष, भवनवासी लोकों में, पृथ्वी के नीचे (अधोलोक में) जितने चैत्यालय हैं उन सबको नमस्कार करता हूँ |5|

    द्वौ कुंदेंदु-तुषार-हार-धवलौ द्वाविंद्रनील-प्रभौ,
    द्वौ बंधूक-सम-प्रभौ जिनवृषौ द्वौ च प्रियंगुप्रभौ |
शेषाः षोडश जन्म-मृत्यु-रहिताः संतप्त-हेम-प्रभाः,
ते संज्ञान-दिवाकराः सुरनुताः सिद्धिं प्रयच्छंतु नः ||
अर्थ - दो   (चन्द्रप्रभ और पुष्पदन्त)   कुन्द पुष्प, चन्द्रमा, बर्फ जैसे हीरों के हार के समान श्वेत वर्ण के, दो   (मुनिसुव्रत नाथ और नेमिनाथ) इन्द्रनील  वर्ण के, दो   (पद्म प्रभ तथा वासु पूज्य)   बन्धूक पुष्प के समान लाल, एवं  दो (सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ)   प्रियंगु मणि (पन्ना)  के समान हरित वर्ण, एवं   तपे   हुए   स्वर्ण   के समान   शेष   सोलह;   ऐसे   जन्म   मरण    से रहित,  सद्ज्ञान-सूर्य, देव-वन्दित (चौबीसों) तीर्थंकर हमें मुक्ति प्रदान करें |6|
    ॐ ह्रीं   कृत्रिमाकृत्रिम- चैत्यालय   सम्बन्धि   चतुर्विंशति  जिनबिम्बेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा  ||

                इच्छामि भक्ति
        (बोलते समय पुष्पांजलि क्षेपण करें)
    इच्छामि भंते! चेइयभत्ति काओसग्गो कओ तस्सालोचेउं |
    अहलोय तिरियलोय उड्ढलोयम्मि किट्टिमाकिट्टिमाणि
    जाणि जिणचेइयाणि ताणि सव्वाणि तीसुवि, लोयेसु
    भवणवासिय वाण-विंतर-जोयसिय-कप्पवासिय त्ति
    चउविहा देवाः सपरिवारा दिव्वेणं गंधेण दिव्वेण पुफ्फेण
    दिव्वेण धूवेण दिव्वेण चुण्णेण दिव्वेण वासेण
    दिव्वेण ण्हाणेण णिच्चकालं अच्चंति पुज्जंति वंदंति णमस्संति |
    अहमवि इह संतो तत्थ संताइ णिच्चकालं अच्चेमि पुज्जेमि
    वंदामि णमस्सामि | दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो
    सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ती होउ मज्झं |
    अथ पौर्वाह्निक-माध्याह्निक-आपराह्निक-देववंदनायां-पूर्वा
    चार्यानुक्रमेण सकल-कर्म-क्षयार्थं भावपूजा-वंदना-स्तव-समेतं
    श्रीपंचमहागुरु-भक्तिं कायोत्सर्गं करोम्यहम् ||
अर्थ - हे  भगवान!   मैं   चैत्य   भक्ति   और कायोत्सर्ग करते हुए तत्सम्बंधी  आलोचना   (वर्तमान दोषों को निराकरण हेतु प्रकट करना)    करना चाहता  हूँ | अधोलोक, मध्य लोक और ऊर्ध्वालोक में जितनी कृत्रिम और अकृत्रिम जिन प्रतिमाएँ हैं उन सबकी भवन वासी, व्यंतर, ज्योतिष और कल्पवासी चारों निकाय के देव अपने परिवार सहित दिव्य (स्वर्ग में होने वाली) गंध से,  दिव्य पुष्प से, दिव्य धूप से, (पंच प्रकार) के दिव्य-चूर्ण से, दिव्य सुगंधित द्रव्य से, दिव्य अभिषेक से हमेशा अर्चना करते हैं, पूजा करते हैं, वन्दना करते हैं, नमस्कार करते हैं | मैं भी यहीं से वहां स्थित सभी प्रतिमाओं की हमेशा अर्चना करता हूं, पूजा करता हूं, वंदना करता हूं, नमस्कार करता हूं | मेरे दुःख क्षय हों, कर्म क्षय हों, बोधि (ज्ञान अथवा रत्नत्रय का) लाभ हो शुभ गति में गमन हो, समाधि मरण हो तथा जिनेन्द्र भगवान की गुण रूपी सम्पत्ति मिले | 
            (इस प्रकार आशीर्वाद रूप पुष्पांजलि क्षेपण करें)
सकल   कर्मों   का   क्षय   करने   के   लिए   मैं प्रातः   कालीन,  मध्याह्नकालीन तथा सायंकालीन देव वंदना में पूर्वाचार्यों के अनुसार भावपूजा, वंदना तथा स्तुति के द्वारा पंच परमेष्ठियों की भक्ति तथा कायोत्सर्ग (परिणामों की -  शुद्धता हेतु आसन, निश्चलता आदि से शरीर को तप्त) करता हूँ | 

    जाव अरिहंताणं भयवंताणं पज्जुवासं करेमि,
    ताव कायं पावकम्मं दुच्चरियं वोस्सरामि |
    णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं |
    णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ||
अर्थ - जितने समय तक मैं अरिहन्तादि भगवन्तों को नमस्कार एवं पर्युपासना करता हूँ तब तक मैं शरीर से ममत्त्व भाव, पाप कर्म तथा दुष्ट आचरण का त्याग करता हूँ | अरिहंतो को नमस्कार हो, सिद्धों को नमस्कार हो, आचार्यों नमस्कार हो, उपाध्यायों नमस्कार हो, लोक के सर्वसाधुओं को नमस्कार हो |
        (नौ बार णमोकार मंत्र 27 श्वासोच्छ्वासों में जाप करें)

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                                                                        (Hindi Version)

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