होम

 जैन धर्म 

 तीर्थकरों 

 जैन साहित्य     

जैन आचार्य

जैन पर्व

 जैन तीर्थ

 होम(Home) >  
जैन पर्व(Jain Festivals) >

 

 

 

 

 

 

 

   सम्यग्दर्शन-पूजा -
  दोहा -  
सिद्ध अष्ट-गुणमय प्रगट, मुक्त-जीव-सोपान |
ज्ञान चरित जिंह बिन अफल, सम्यक् दर्श प्रधान ||
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शन! अत्र अवतर अवतर संवौषट् |
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शन! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शन! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् |


सोरठा -  
नीर सुगंध अपार, तृषा हरे मल छय करे |
सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजौं सदा ||
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |1|
जल केशर घनसार, ताप हरे शीतल करे | सम्य0
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा |2|
अछत अनूप निहार, दारिद नाशे सुख भरे | सम्य0
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा |3|
पुहुप सुवास उदार, खेद हरे मन शुचि करे | सम्य0
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा |3|
नेवज विविध प्रकार, छुधा हरे थिरता करे | सम्य0
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा |5|
दीप-ज्योति तमहार, घट पट परकाशे महा | सम्य0
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा |6|
धूप घ्रान-सुखकार, रोग विघन जड़ता हरे | सम्य0
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा |7|
श्रीफल आदि विथार, निहचे सुर-शिव-फल करै | सम्य0
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय फलं निर्वपामीति स्वाहा |8|
जल गंधाक्षत चारु, दीप धूप फल फूल चरु |
सम्यग्दर्शन सार, आठ अंग पूजौं सदा ||
ॐ ह्रीं अष्टांग सम्यग्दर्शनाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |9|

जयमाला
दोहा -
 
आप आप निहचै लखे, तत्त्व-प्रीति व्योहार |
रहित दोष पच्चीस हैं, सहित अष्ट गुन सार |1|
सम्यक् दरशन-रत्न गहीजै, जिन-वच में संदेह न कीजै |
इह भव विभव-चाह दुखदानी, पर-भव भोग चहे मत प्रानी |2|
प्रानी गिलान न करि अशुचि लखि, धरम गुरु प्रभु परखिये |
पर-दोष ढकिये, धरम डिगते को सुथिर कर, हरखिये |3|
चहुं संघ को वात्सल्य कीजै, धरमकी परभावना |
गुन आठ सों गुन आठ लहिके, इहां फेर न आवना |4|
ॐ ह्रीं अष्टांगसहित पंचविंशति दोषरहित सम्यग्दर्शनाय पूर्णार्घ्यंनिर्व0 |
इत्याशीर्वादः (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)
   

 
  
         

 
                                                                                         

                                                                        (Hindi Version)

                                         Site copyright ã 2004, jaindharmonline.com All Rights Reserved                  

                                                             Best viewed at 800 x 600 screen size