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Pawapuri
Pawapuri Jain Temple

 

Rajgriha Jain Temple
 Rajgriha Jain Temple
Kundalpur Jain Temple
Kundalpur Jain Temple


Khandgiri Jain Temple

   जैन तीर्थ (Jain Tirth )
सिद्ध-क्षेत्रों की अर्घ्यावली
 (1)   श्री अष्टापद (कैलाश) सिद्ध क्षेत्र (हिमालय पर्वत)
            जल आदिक आठों द्रव्य लेय, भरि स्वर्णथार अर्घहि करेय |
            जिन आदि मोक्ष कैलाश थान, मुन्यादि पाद जजूँ जोरि पान ||
ऊँ ह्रीं श्रीकैलाश पर्वत सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा | 

 (2)   सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र (झारखण्ड) 
            जल गंधाक्षत पुष्प सु नेवज लीजिये |
            दीप धूप फल लेकर अर्घ सु दीजिये ||
            पूजौं शिखर सम्मेद सु-मन-वच-काय जी |
            नरकादिक दुख टरें अचल पद पायजी ||
ऊँ ह्रीं  श्रीसम्मेद शिखर सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा | 

 (3)   गिरनार सिद्ध क्षेत्र (गुजरात)
            अष्ट द्रव्य को अर्घ्य संजोयो, घण्टा नाद बजाई |
            गीत नृत्य कर जजौं 'जवाहर' आनन्द हर्ष बधाई ||
            जम्बु द्वीप भरत आरज में, सोरठ देश सुहाई |
            शेषावन के निकट अचल तहं, नेमिनाथ शिव पाई ||
ऊँ ह्रीं श्रीगिरनार सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा | 

 (4)  श्री चम्पापुर सिद्ध क्षेत्र (बिहार)
            जल फल वसु द्रव्य मिलाय, लै भर हिम थारी |
            वसु अंग धरा पर ल्याय, प्रमुदित चित्तधारी ||
            श्री वासु पूज्य जिनराय, निर्वृतिथान प्रिया |
            चंपापुर थल सुख दाय, पूजौं हर्ष हिया ||
ऊँ ह्रीं श्रीचम्पापुर सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा | 

 (5)   श्री पावापुरी सिद्ध क्षेत्र (बिहार)
            जल गंध आदि मिलाय वसुविध थार स्वर्ण भरायके |
            मन प्रमुद भाव उपाय करले आय अर्घ्य बनायके ||
            वर पद्मवन भर पद्मसरवर बहिर पावा ग्राम ही |
            शिव धाम सन्मति स्वामी पायो, जजौं सो सुखदा मही ||
ऊँ ह्रीं  श्रीपावापुरी सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा |  

 (6)   श्री सोनागिरि सिद्ध क्षेत्र (मध्यप्रदेश)
            वसु द्रव्य ले भर थाल कंचन अर्घ दे सब अरि हनूं |
            'छोटे' चरण जिन राज लय हो शुद्ध निज आत्म बनूं |
            नंगाऽनंगादि मुनीन्द्र जहं ते मुक्ति लक्ष्मी पति भये |
            सो परम गिरवर जजूं बस विधि होत मंगल नित नये ||
ऊँ ह्रीं  श्रीसोनागिरि सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा | 

 (7)  श्री नयनागिरि (रेशन्दीगिरि) सिद्ध क्षेत्र (मध्यप्रदेश)
            शुचि अमृत आदि समग्र, सजि वसु द्रव्य प्रिया |
            धारौं त्रिजगत पति अग्र, धर वर भक्त हिया ||
ऊँ ह्रीं   श्रीनयनागिरि  सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा |  

(8)   श्री द्रोणगिरि सिद्ध क्षेत्र (मध्यप्रदेश)
            जल सु चन्दन अक्षत लीजिये, पुष्प धर नैवेद्य गनीजिये |
            दीप धूप सुफल बहु साजहीं, जिन चढा़य सुपातक भाजहीं ||
ऊँ ह्रीं  श्रीद्रोणगिरि  सिद्धक्षेत्राय   अनर्घ्यपद   प्राप्तये अर्घ्य नि0   स्वाहा | 

 (9)   सिद्धवर कूट सिद्ध क्षेत्र (मध्यप्रदेश)
            जल चन्दन अक्षत लेय, सुमन महा प्यारी |
            चरु दीप धूप फल सोय, अरघ करौं भारी ||
            द्वय चक्री दस काम कुमार, भवतर मोक्ष गये |
            तातें पूजौं पद सार, मन में हरष ठये ||
ऊँ ह्रीं  श्रीसिद्धवरकूट सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा |  

 (10)   श्री शत्रुञ्जय सिद्ध क्षेत्र (गुजरात)
            वसु द्रव्य मिलाई, थार भराई, सन्मुख आई नजर करो |
            तुम शिव सुखदाई धर्म बढ़ाई, हर दुखदाई, अर्घ करो ||
            पांडव शुभ तीनं सिद्ध लहीनं, आठ कोड़ि मुनि मुक्ति गये |
            श्री शत्रुञ्जय पूजौं सन्मुख हूजो, शान्तिनाथ शुभ मूल नये ||
ऊँ   ह्रीं श्रीशत्रुंजय सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये    अर्घ्य नि0    स्वाहा |

 (11)   श्री तुंगीगिरि सिद्ध क्षेत्र (महाराष्ट्र)
            जल फलादि वसु दरव सजाके, हेम पात्र भर लाऊँ |
            मन वच काय नमूं तुम चरना, बार बार शिर नाऊँ ||
            राम हनू सुग्रीव आदि जे, तुंगीगिर थिरथाई |
            कोड़ी निन्यानवे मुक्ति गये मुनि, पूजूं मन वच काई ||
ऊँ   ह्रीं  श्रीतुंगीगिरि सिद्धक्षेत्राय  अनर्घ्यपद    प्राप्तये    अर्घ्य   नि0    स्वाहा |  

 (12)   श्रीकुन्थलगिरि सिद्ध क्षेत्र (महाराष्ट्र)
            जल फलादि वसु दरव लेय थुति ठान के |
            अर्घ जजौं तुम पाप हरो हिय आनके ||
            पूजौं सिद्ध सु क्षेत्र हिये हरषाय के |
            कर मन वच तन शुद्ध, करमवश टारके ||
ऊँ   ह्रीं  श्रीकुन्थलगिरि   सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद  प्राप्तये  अर्घ्य   नि0  स्वाहा | 

 (13)   चूलगिरि  (बावन गजा)  सिद्ध क्षेत्र (मध्यप्रदेश)
            सजि सौंज आठों होय ठाड़ा, हरष बाढ़ा कथन विन |
            हे नाथ भक्तिवश मिले जो, पुर न छुटे एक दिन ||
            दशग्रीव अंगज अनुज आदि, ऋषीश जहंते शिव लहो |
            सो शैल बड़वानी निकट गिरिचूल की पूजा ठहो ||
ऊँ   ह्रीं  श्रीचूलगिरि सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद  प्राप्तये  अर्घ्य   नि0  स्वाहा |   

 (14)   श्रीगजपंथ सिद्ध क्षेत्र (महाराष्ट्र)
             जल फल आदि वसु दरव अति अत्तम, मणिमय थाल भराई |
            नाच नाच गुण गाय गायके, श्री जिन चरण चढ़ाई ||
            बलभद्र सात वसु कोड़ि मुनीश्वर, यहां पर करम खपाई |
            केवल लहि शिव धाम पधारे, जजूँ तन्हें शिर नाई ||
ऊँ   ह्रीं  श्रीगजपंथ सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा |  

 (15)   श्रीमुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्र (मध्यप्रदेश)
            जल गंध आदिक द्रव्य लेके, अर्घ कर ले आवने |
            लाय चरन चढ़ाय भविजन, मोक्षफल को पावने ||
            तीर्थ मुक्तागिरि मनोहर, परम पावन शुभ कहो |
            कोटि साढ़े तीन मुनिवर, जहाँ ते शिवपुर लहो ||
ऊँ   ह्रीं  श्रीमुक्तागिरि  सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा |  

 (16)   पावागढ़ सिद्ध क्षेत्र (गुजरात)
            वसु द्रव्य मिलाई भविजन भाई, धर्म सुहाई अर्घ करुँ |
            पूजा को गाऊँ हर्ष बढ़ाऊं, खूब नचाऊँ प्रेम भरुं ||
            पावा गिरि वन्दौं मन आनन्दौं, भव दुख खंदौं चितधारी |
            मुनि पाँच जुकोड़ं भवदुख छोड़ं, शिवमुख जोड़ं सुखभारी ||
ऊँ   ह्रीं  श्रीपावागढ़  सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा | 

 (17)   रेवातट (नेमावर, म.प्र.) स्थित सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र
            रेवानदी के तीर पर सिद्धोदय है क्षेत्र,
            इसके दर्शन मात्र से खुलता सम्यक् नेत्र |
            रावण-सुत अरु सिद्ध मुनि साढ़े पांच करोड़,
            ऐसे अनुपम क्षेत्र को पूजूं सदा कर जोड़ ||
ऊँ ह्रीं श्रीरेवातट स्थित सिद्धोदय सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य- नि0 स्वाहा |   

 (18)   ऊन   (पावागिरि, म.प्र.) सिद्ध क्षेत्र
            जल फल वसु द्रव्य पुनित, लेकर अर्घ करुं |
            नाचूं गाऊं इह भांति, भवतर मोक्ष वरुं ||
            श्री पावा गिरि से मुक्ति, मुनिवर चारि लही |
            तिन इक क्रम से गिन, चैत्य पूजत सौख्य लही ||
ऊँ ह्रीं  श्रीपावागिरि(ऊन)   सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा | 

 (19)   कोटिशिला सिद्ध क्षेत्र (उड़ीसा)
            जल फल वसु दरव पुनीत, लेकर अर्घ करुं |
            नाचूं गाऊं इह भांति, भवतर मोक्ष वरुं ||
            श्री कोटिशिला के मांहि, जशरथ तनय कहै |
            मुनि पंच शतक शिवलीन, देश कलिंग दहै ||
ऊँ ह्रीं श्रीकोटिशिला सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा | 

 (20)   तारंगागिरि  सिद्ध क्षेत्र (गुजरात)
            शुचि आठों द्रव्य मिलाय तिनको अर्घ करौं, 
            मन वच तन देहु चढ़ाय भवतर मोक्ष वरौं |
            श्री तारंगागिरि से जान, वरदत्तादि मुनी,
            त्रय अर्ध कोटि परमान ध्याऊँ मोक्षधनी ||
ऊँ ह्रीं  श्रीतारंगागिरि सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य नि0 स्वाहा |  

 (21)   श्री गौतम गणधर निर्वाण-स्थली (गुणावा, बिहार)
            जल फल आदिक द्रव्य इकट्ठे लीजिये,
            कंचन थारी मांहि अरघ शुभ कीजिये |
            ग्राम गुणावा जाय सु मन हर्षाय के,
            गौतम स्वामी चरण जजौं मन लायके ||
ऊँ ह्रीं श्रीगौतम गणधर निर्वाण स्थली गुणावा सिद्धक्षेत्राय अर्घ्य- नि0 स्वाहा | 

 (22)   जम्बु स्वामी निर्वाण-स्थली (चौरासी, मथुरा सिद्ध क्षेत्र, उ.प्र.)
            जल फल आदिक द्रव्य आठहू लीजिये,
            कर इकठी भरि थाल अर्घ शुभ कीजिये |
            मथुरा जम्बू स्वामी मुक्ति थल जायके,
            पूजित भवि धरि ध्यान सुयोग लगायके ||
ऊँ ह्रीं श्री जम्बुस्वामी निर्वाणस्थली चौरासी मथुरा सिद्धक्षेत्राय अर्घ्य- नि0 स्वाहा |
 

      
 
  
   
   
 
                                                                                                          

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