होम

 जैन धर्म 

 तीर्थकरों 

 जैन साहित्य     

जैन आचार्य

जैन पर्व

 जैन तीर्थ

  होम(Home)>  
तीर्थकरों(Tirthankara) >

  तीर्थकर पा‌र्श्वनाथ
 
    
तीर्थकर पा‌र्श्वनाथ       
            

  

   
 

 

  Bhagavan Parshvanath (श्रीपार्श्वनाथ)  
      

    तीर्थकर पा‌र्श्वनाथ का जन्म बाईसवें तीर्थकर भगवान नेमिनाथ के  3750 वर्ष बाद काशी (बनारस) के राजा काश्यप गोत्रीय विश्वसेन तथा रानी वामादेवी के घर पौषकृष्ण एकादशी के दिन अनिल योग में हुआ था। पा‌र्श्वनाथके शरीर की कांति हरे रंग की थी। पूर्व जन्मों की श्रृंखला में पा‌र्श्वनाथ पहले भव में ब्राह्मण पुत्र मरुभूति थे तथा उन्हीं के बडे भाई कमठ ने द्वेषवश उनका प्राणान्त  कर दिया था। उसके बाद वही कमठ का जीव विभिन्न योनियों में जन्म लेकर उनके साथ अपना वैर निकालता रहा, किंतु  पा‌र्श्वनाथके जीव ने कभी उसका प्रतिकार नहीं किया और वे प्रत्येक विपत्तियां समता पूर्वक सहन करते रहे।
उसी जीव का जन्म अंतिम भव के रूप में पा‌र्श्वनाथ बन कर राजा विश्वसेन तथा रानी वामादेवी के राजघराने में हो गया। राजा के यहां सुलभ संसार की सभी भोग सम्पदायें विरक्त पा‌र्श्वनाथ को आसक्त नहीं बना सकीं। तीस वर्ष की युवावस्था में वे प्रव्रजित हो गए। एक दिन वे देवदारु वृक्ष के नीचे सात दिन का योग लेकर धर्मध्यान में लीन बैठे थे। उसी समय कमठ का जीव शंबर नाम का असुर आकाश मार्ग से जा रहा था। उसने पा‌र्श्वनाथ को तपस्या करते देखा। वह महा गर्जना तथा महावृष्टि करवाने लगा। इसी बीच एक सर्प का जोडा धरणेन्द्र और पद्मावती के रूप में ध्यान में लीन पा‌र्श्वनाथ की रक्षा के लिए स्वत: आ गया। उन्होंने उनके मस्तक पर फण फैलाकर कमठ के उपसर्ग से उनकी रक्षा की। इन सभी घटनाओं से भी विरक्त पा‌र्श्वनाथ अपनी तपस्या से विमुख नहीं हुए और उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हो गई।
कैवल्य ज्ञान प्राप्त होने के बाद उनका समवशरण भारत के विभिन्न स्थलों पर लगा जहां उन्होंने धर्मोपदेश देकर सभी जीवों को आत्मकल्याण का मार्ग बतलाया। इस प्रकार उन्होंने लगभग सत्तर वर्ष तक विहार किया और अन्त में बिहार में स्थित सम्मेदशिखर पर प्रतिभा योग धारण कर विराजमान हो गए  और वहीं से उनको मोक्ष की प्राप्ति हुई (939 B.C.)। आज भी तीर्थकर पा‌र्श्वनाथ के मंदिर भारत में हजारों की संख्या में हैं। उनकी पहचान सर्पफण से की जाती है। अधिकांश जैन स्तुतिपरक साहित्य, भजन या स्तोत्र, तंत्र-मंत्र तथा चमत्कार से सम्बंधित साहित्य पा‌र्श्वनाथ से ही संबंधित है। प्रत्येक जैन धर्मानुयायी उनकी निर्वाण स्थली सम्मेदशिखर स्थित पा‌र्श्वनाथटोंक तथा जन्म स्थली बनारस में भेलूपुर स्थित मंदिर की वंदना तथा दर्शन अपने जीवन में एक बार जरूर करना चाहता है। पा‌र्श्वनाथ जयंती पर काशी में एक भव्य शोभायात्रा निकलती है तथा विशाल अभिषेक तथा विशेष पूजन, अनुष्ठान भी आयोजित होता है।

   तीर्थकर पा‌र्श्वनाथ का देशना स्थल, ग्वालियर धर्म, इतिहास, पुरातत्व, कला, संस्कृति एवं साहित्य के लिए विख्यात है। जैन धर्मावलम्बियों के लिए यह स्थल अत्यंत पूजनीय है  क्योंकि जैन धर्म के तेईसवें तीर्थकर भगवान पा‌र्श्वनाथ कई  बार विहार करते हुए यहां पधारे थे और अपनी दिव्य ध्वनि से  उन्होंने यहां उपदेश भी दिया था। इस बात का प्रमाण गोपाचल पर्वत  पर उत्कीर्ण लगभग सात सौ वर्ष प्राचीन बयालीस फुट ऊंची तथा तीस फुट चौडी पद्मासन मुद्रा में तीर्थकर भगवान पा‌र्श्वनाथकी प्रतिमा है, मानो समवशरण और दिव्य देशना का आनन्द दे रही प्रतीत होती है। 

 
                                                                                       

                                                                        (Hindi Version)

                                         Site copyright ã 2004, jaindharmonline.com All Rights Reserved                  

                                                             Best viewed at 800 x 600 screen size