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जैन सरस्वती प्रतिमाएँ
                                                                                                            
     जैन सरस्वती प्रतिमाएँ
  
     Jain Sarswati in Mount Abu Jain Temple
     Jain Sarswati - Mount Abu Jain Temple

    बुद्धि तथा ज्ञान की देवी सरस्वती का पूजन अति प्राचीन काल में भारत में लोकप्रिय था | विद्या, ज्ञान और विवेक की देवी होने के कारण सरस्वती का दूसरा नाम वाणी भी है | वीणा और पुस्तक ;सरस्वती के विशेष आयुध हैं| इनका वाहन हंस कहा जाता है, |
बौद्ध ग्रन्थों में सरस्वती के कई स्वरुपों का वर्णन किया& गया है जैसे- महासरस्वती, वज्रवीणा, वज्रशारदा सरस्वती, आर्य सरस्वती, वज्र सरस्वती आदि | मौन रहते हुए भी ज्ञान कराने वाली वीणा को धारण करने वाली सरस्वती है |
जैनधर्म में सोलह विद्या देवियाँ हैं | ये सोलह विद्या देवियाँ अपने नाम के अनुसार वाणी की विभिन्न प्रकृतियों के कल्पित मूर्तरुप हैं | विद्यादेवियों का स्वरुप बतलाते समय प्रायः सभी ग्रन्थों में उन्हें ज्ञान से संयुक्त बताया है | विद्यादेवियों की मूर्तियों की लोकप्रियता श्वेताम्बर स्थलों तक ही सीमित है - अभी तक यह धारणा रही है किन्तु सोलह विद्यादेवियों के इस मूर्तांकन से इस ;धारणा का निराकरण हो जाता है यह उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि दिगम्बर परम्परा में भी विद्यादेवियों की मूर्तियों का निर्माण होता रहा है | ये विद्यादेवियाँ मूलतः तान्त्रिक देवियाँ हैं |
जैनधर्म में विद्या की सोलह देवियों के अतिरिक्त एक श्रुत देवी भी है | जैन लोग ज्येष्ठ मास के शुक्ल पंचमी को जैन 'ज्ञानपंचमी' या श्रुत पंचमी भी कहते हैं और उस दिन श्रुत देवी एवं शास्त्रों की विधिवत् पूजा का विधान दिगम्बरों में है तथा कार्तिक मास की शुक्ल पंचमी को श्रुत देवी की पूजा का विधान जैन परम्परा में है | 
चौबीस तीर्थंकरों की पहचान के लिए जैसे उनके चिह्न के अंकन की परम्परा है साथ ही इनके पहचान का दूसरा साधन पादपीठ में अंकित शासन यक्ष-यक्षिणी भी है | किन्तु तीर्थंकर मूर्तियों के साथ उनके यक्ष-यक्षियों के अंकन की परम्परा अधिक प्रचलित नहीं है | गौरी, वज्राकुंशी, वज्रश्रृंखला, वज्र-गांधारी, प्रज्ञापारमिता, विद्युज्वालाकराली जैसी देवियों की मान्यता बौद्ध परम्परा में भी रही है | श्वेताम्बर परम्परा में भी कुछ नाम-मात्र की भिन्नता के साथ सोलह विद्यादेवियों के अंकन की परम्परा है |

 मथुरा से प्राप्त प्राचीनतम सरस्वती मूर्ति
सरस्वती की अत्यन्त प्रारम्भिक मूर्ति मथुरा के कंकाली टीले से उत्खनन से प्राप्त हुई जो सम्प्रति लखनऊ संग्रहालय की निधि है | इसमें सर्वप्रथम सरस्वती का अंकन ग्रन्थों में वर्णित समस्त विशेषताओं से युक्त रुप में प्राप्त होता है | देवी जिसका सिर खंडित है, चौकोर आसन पर आसीन है | उसके बाँये हाथ में सूत्र से बँधी पुस्तक प्रदर्शित है व दाहिना हाथ खण्डित हैं, जिसमें अक्षमाला स्थित था जिसके आठ मनके अभी भी स्पष्ट दीख रहे है | ब्राह्मी लि पि के लेख से युक्त इस प्रतिमा को 132 ई0 में तिथ्यांकित किया गया है जो कुषाणशासक कुविष्क के समय में पड़ता है |
केन्द्रीय संग्रहालय, इन्दौर की मूर्तियाँ
केन्द्रीय संग्रहालय इन्दौर में हिंगलाजगढ़, जिला मन्दसौर से प्राप्त सन् 1018 ई. की विद्यादेवी अच्युता की एक खड्गासन में भग्न मूर्ति है | यह शीर्ष विहीन है और भुजाएँ भी क्षत-विक्षत हैं | देवी के दोनों ओर पार्श्व में कटि से नीचे खड़ी हुई एक-एक स्त्री तथा दोनों चरणों में बैठे हुए दाहिने ओर एक पुरुष भक्त और बायीं ओर स्त्री भक्त की आकृति बनी हुई है |
उसी संग्रहालय में विजवाड, जिला देवास, से प्राप्त लगभग 11वीं शती ईस्वी कि जैन श्रुतदेवी की खड्गासन मूर्ति भी है | देवी की मूर्ति के शीर्ष पर तीन तीर्थंकर मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं | पार्श्व में कुछ अन्य आकृतियाँ हैं तथा चरणों के समीप दोनों पार्श्व में एक-एक खड़ी स्त्री मूर्ति है |

ब्रिटिश म्यूजियम में वाग्देवी प्रतिमाएँ

                                     Jain Swarsawti British Museum
             ब्रिटिश म्यूजियम, लन्दन, में वाग्देवी की एक खंडित प्रतिमा
 ब्रिटिश म्यूजियम, लन्दन, में धारा के खंढहरों से प्राप्त वाग्देवी की एक खंडित प्रतिमा है | प्रतिमा की पादपीठ पर अभिलिखित लेख (जो कहीं-कहीं त्रुटित है) के अनुसार वाग्देवी की यह प्रतिमा राजा भोज की चन्द्रनगरी धारा में सूत्रधार हिरसुत मनथल (मणथल) ने बनाई थी और उस पर लेख संवत् 1091 (सन् 1034 ई.) में शिवदेव ने लिखा था | मुकुटधारिणी वस्त्राभूषण अंलकृता इस खड्गासन सरस्वती मूर्ति के शीर्ष के दक्षिण पार्श्व में जिनदेव की मूर्ति का अंकन है | दायें हाथ में ऊपर की ओर वह अंकुश धारण किये हुए है | चूंकि दोनों ओर हाथ क्षतिग्रस्त हैं, यह कहना कठिन है कि वह चतुर्भुजा है अथवा दो भुजाओं वाली | बायें हाथ का आगे का भाग क्षतिग्रस्त है | जितना अवशिष्ट है उससे अनुमान होता है कि वह उसमें अक्षमाला धारण किये रही होगी | शीर्ष के बायें पार्श्व में भी कुछ आकृतियां बनी हुई हैं, जो अस्पष्ट हैं | देवी के दाहिने पैर के पार्श्व में ऊपर-नीचे दो पुरुष आकृतियां बनी हुई हैं | इनमें से ऊपर वाली प्रौढ़ पुरुष आकृति को राजा भोज से तथा नीचे की युवा आकृति को श्रीफल लिये हुए महाकुमार से चीन्हा गया है | उसी प्रकार देवी के बायें पैर के पार्श्व में भी ऊपर-नीचे दो आकृतियां बनी हुई हैं |
 

 लास एंजिल्स काउण्टी म्यूजियम आफ आर्ट में सरस्वती मूर्ति
इस म्यूजियम में गुजरात में मूर्त शिल्पी जगदेव द्वारा वर्ष 1153 में निर्मित श्वेत संगमरमर की सवा सैंतालीस इंच (120 सेमी.) की त्रिभंग मुद्रा में खड़ी सरस्वती की कमनीय मूर्ति है | चतुर्भुजा देवी की दो भुजाएँ क्षत प्रतीत होती हैं | अपने बायें कर में वह अक्षमाला पकड़े हुए है | दाहिने हाथ में भी वह कुछ पकड़े हुए है जिसकी आकृति स्पष्ट नहीं हैं | साथ ही दोनों ओर हाथों के ऊपर किसी अर्द्धचन्द्रकार धरातल पर पक्षी युगल का अंकन है और एक-एक मानवाकृति बनी है जो अस्पष्ट है | देवी की जंघाओं के दोनों ओर एक-एक परिचारिका के चरणों में एक भक्त बैठा हुआ है |

 राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली, में सरस्वती मूर्ति
इस संग्रहालय में राजस्थान के बीकानेर जिले के पल्लू स्थान से प्राप्त 1.48 मीटर ऊँचाई की श्वेत संगमरमर से निर्मित खड्गासन सरस्वती मूर्ति है | चतुर्भुजा यह सरस्वती देवी एक पूर्ण विकसित पद्म-पुष्प पर आकर्षक त्रिभंग मुद्रा में खड़ी है | देवी अपनी बायीं भुजा में ऊपर के कर में डोरी से बँधी हुई एक ताड़पत्रीय पोथी और नीचे हाथ में कमण्डल (जल-कलश) धारण किये हुए है | दाहिनी भुजा में ऊपर के कर में श्वेत कमल और नीचे हथेली पर अक्षमाला ग्रहण किये धारण किये हुए है | दाहिनी भुजा में ऊपर के कर में श्वेत कमल और नीचे हथेली पर अक्षमाला ग्रहण किये पारदर्शी वस्त्रावृता ये देवी शीश पर अति अंलकृत शिरोभूषण, कण्ठमाला और भुजबन्द धारण किये हुए है और साड़ी कटि-भाग पर एक अत्यन्त अंलकृत करधनी से आबद्ध है | देवी के सिर के पीछे कमलाकार आभामण्डल है और सबसे ऊपर जिनेन्द्र की लघु मूर्ति है | यह मूर्ति बारहवीं शती ईस्वी की चाहमान कला की उत्कृष्ट कृति मानी जाती है | 

 बीकानेर संग्रहालय की वाग्देवी की मूर्ति

                                   Jain Swarswati , Pallu Bikaner
बीकानेर संग्रहालय में भी बीकानेर के संभवतः पल्लू क्षेत्र से ही प्राप्त संगमरमर की वाग्देवी की मूर्ति है | मुख्य मूर्ति राष्ट्रीय संग्रहालय में गृहित उपर्युक्त मूर्ति से आकार-प्रकार में बहुत कुछ साम्य रखती है किन्तु दाहिने और बायें पार्श्व में परिचारिकाओं के ऊपर एक-एक लघु आकृति बनी हुई है और यह वाग्देवी दोनों पार्श्व में अलंकृत स्तंभो और तोरण से सज्जित है | तोरण में शीर्ष भाग पर तथा दोनों पार्श्व में मंदिर के तीन आका बने हैं |

  लाडनूँ में जैन सरस्वती प्रतिमा

                                           Jain swarswati Ladnun, Rajasthan
 राजस्थान में नागौर जिले के लाrडनूँ नगर के दिगम्बर जैन बड़ा मन्दिर के तलघर में दाहिनी ओर श्री नथमल जी सेठी द्वारा नवनिर्मित वेदी में स्थित सरस्वती की यह मूर्ति कलात्मकता, भव्यता एवं सौम्यता आदि गुणों में अद्वितीय मूर्ति कही जा सकती है | मूर्तिकला के क्षेत्र में जैन सरस्वती ; की विभिन्न लक्षणों एवं मुद्राओं में प्राचीन से प्राचीन और अर्वाचीन मूर्तियों के उदाहरण हैं किन्तु अभी तक पल्लू (बीकानेर) से प्राप्त सरस्वती की दोनों प्रतिमायें ही प्रसिद्ध हैं | इनमें से एक बीकानेर के संग्रहालय, दिल्ली में तथा दूसरी राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली में संग्रहीत है | किन्तु लाडनूँ के इस मन्दिर में प्रतिष्ठित जैन सरस्वती मूर्ती की भावपूर्ण मोहक मुखमुद्रा एवं कलाकार की अद्भुत कला का संयोजन देखकर दर्शक अपने आपको धन्य मान लेता है |
लाडनूँ के इस मंदिर में प्रतिष्ठित सरस्वती की मूर्ति बारहवीं शती के मध्यकाल की है | श्वेत संगमरमर के एक बड़े पाषाणफलक पर उत्कीर्ण साढ़े तीन फुट ऊँची यह खड्गासन मूर्ति का श्वेत रुप जीवन की पवित्रता का द्योतक है |
भगवती सरस्वती पद्मपीठ पर त्रिभंग मुद्रा में खड़ी है | इस मुद्रा में तनिक भंगिमा के साथ अंगयष्टि अनुपम सौन्दर्य की प्रतीक है | अत्यधिक प्रशान्त मुख तथा पीछे अनेक किरणों युक्त अलंकारिक प्रभामंडल सम्पूर्ण आकृति में ऐक्य, निर्मलता और ओज है | शिर के ऊपर का अलंकार खचित चौकोर एवं ऊँचा करण्डमुकुट (शिरोभूषण) धारण किये है जो कि नुकिला एवं शिखरयुक्त है, जिसमें जगह-जगह मोती आदि जड़े हुए प्रदर्शित हैं | प्रभामंडल के ऊपर क्रमशः दो अलंकृत अर्द्धवृत्ताकार घेरा है | पाषाण फलक के अग्रभाग में बीचोंबीच पद्मासन एवं ध्यानस्थ मुखमुद्रा में एक लघु जिन प्रतिमा हैं |
देवी के ऊपरी दोनों हाथों के पास दोनों कोनों पर उड़ते हुए दो मालाधर उत्कीर्ण हैं, जो अपने हाथों में माला सम्हाले हुए हैं | देवी के दोनों कानों के ऊपरी भाग में तीन लड़ियों वाले झुमके तथा नीचे के भाग में गुँथे हुए बड़े-बड़े कुण्डल हैं | चूंकि करण्डमुकुट से शिर ढका हुआ है फिर भी कानों के आसपास की केशसज्जा बड़ी ही सुन्दर है | गले में अतिसेर युक्त ग्रैवेयेक एवं प्रलम्बहार आदि विविध हार, माला आदि कण्ठाभरण धारण किये हैं | वक्ष पर पाँच लड़ियों वाला मुक्ताहार दोनों पुष्ट स्तनों के ऊपर से गहरी नाभि के पास तक लटक रहा हैं, जिसकी बगली फुन्दे दायीं ओर से पीछे की तरफ झूलते हुए दर्शाये गये हैं | कटिभाग में अलंकृत चौड़ा कटिबन्द तथा मोतियों की जालयुक्त मेखला (करधनी) धारण किये हुए है, जिससे बिना तहों वाला अधोवस्त्र (धोती) आबद्ध है | सामने कमर में जहाँ अधोवस्त्र कमर से बनमाला के पास तक अलग-अलग दोनों ;पैरों पर कई लहरियों के रुप में उत्कीर्ण किया गया है | दोनों जंघाओं पर मोतियों की लड़ियों, झालरों एवं सुनियोजित अलंकृत लटकनों को देखने से उस समय में प्रचलित नारी के विविध आभूषणों की समृद्ध परम्परा का ज्ञान होता है |
देवी की चार भुजायें हैं, जिनमें मंगलसूचक उपकरण हैं| सरस्वती के चार हाथों की कल्पना भी जैनागमों के प्रथमानुयोग, द्रव्यानुयोग, चरणानुयोग और करणानुयोग के रुप चार अनुयोगों के आधार पर की गई है | बायीं ओर के उपरी हाथ में रेशमी डोर से कलात्मक ढंग से बँधे हुए ताड़पत्रीय शास्त्र की लम्बी पाण्डुलिपि है जो इस बात का प्रतीक है कि वस्तुतः शास्त्रों के स्वाध्याय से ही ज्ञान की उपासना होती है | दूसरे हाथ में कमण्डलु की तरह कलश जलकुम्भ या कुण्डिका है | कुम्भ ज्ञान के कोष का प्रतीक है | सरस्वती विद्या की देवी होने के कारण कुम्भ को भी देवी का प्रतीक माना है | दाहिने ओर के ऊपरी हाथ में अच्छी तरह गुँथा हुआ टहनी युक्त एक बड़ा-सा पद्म गुच्छक है | खिले हुए श्वेत कमल का यह पद्मगुच्छक विद्या की पवित्रता, सौरभता, सार्वभौमिकता तथा प्रसन्नता का प्रतीक है | सरस्वती का जहाँ कहीं भी निवास होता है, वहाँ पर ये गुण स्वमेय विद्यमान रहते हैं |
इसी पद्म गुच्छक (हंसयुक्त मृणाल-दण्ड) के मध्य में सामने परस्पर एक दूसरे को देखते हुए हंसयुगल उत्कीर्ण है |
जप-ध्यान के प्रसाद से ही ज्ञान की साधना होती है अतः उसके प्रतीक के रुप में दायीं ओर के नीचे वाले हाथ में अक्षमाला उत्कीर्ण है | काल के प्रभाव से इस माला के कुछ मनके टूट चुके हैं | चारों भुजायें विविध आभुषणों से अलंकृत हैं | इनमें चौड़े तिकोने कलात्मक भुजबन्ध (बाजूबन्द) तथा कलाई में मोती जटित चूड़ियाँ, कंगन एवं कलाईबन्द आदि आभुषण यथेष्ट मात्रा में हैं | हाथों की लम्बी-लम्बी पतली अगुलियों में अँगूठियाँ प्रदर्शित हैं | पैरों में दो लड़ियों वाली पायलें तथा पैरों के अँगूठों एवं अँगुलियों में बिछुड़ी बखूबी अंकित की गई है |
  

 

                                                                                            

                                                                        (Hindi Version)

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