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लाडनूं कला-संस्कृति और आध्यात्म का दिव्य दर्शन

 लाडनूं कला-संस्कृति और आध्यात्म का दिव्य दर्शन

राजस्थान की वीर प्रसवनी धरती त्याग, शौर्य, बलिदानी वीरों, ध्यानी धीरों व तपस्वियों की यशस्वी धरा एक कूंट (किनारे) पर बसा लाडनूं शहर धर्म, कला, संस्कृति व आध्यात्मिक उत्कर्ष का ज्वलंत उदाहरण है | कोई भी नगर मात्र कुवें, बावड़ियों, गढ़ों, महलों या हवलियों से बड़ा नही नही बनता, उसे बुलंदियों पर पहुंचाती है वहां के ऊर्जावान व्यक्तियों का जीवट, इच्छाशक्ति, शुचिता-पूर्ण सोच व दूर दृष्टि | जहां आध्यात्मिक मूल्यों का अनुसरण व्यक्ति में नई ऊर्जा का संचार करता है वहीं परमार्थिक कार्य सामाजिक समरसता व गंगा जमुनी संस्कृति के द्वार खोलती है | यही भावना आराध्यों के प्रति आस्था मन को निश्कलुष बनाती है |

लाडनूं स्थित बड़ा दिगम्बर जैन मंदिर अपनी भव्यता, प्राचीनता, आध्यात्मिकता तथा कला वैभव के लिये विश्व विख्यात है | प्राचीन मन्दिर का सहस्त्राब्दी महोत्सव 2014 में बड़ी भव्यता के साथ मनाया जायेगा | जिसमें देश विदेश से हजारों भक्तों व लाभार्थियों के आगमन की अपेक्षा है | जैन धर्मावलंबियों के लिये लाडनूं न केवल तीर्थ स्थल है वरन् एक धर्मनगरी का स्वरुप है | यहां 31 पंचकल्याण प्रतिष्ठायें हो चुकी है जो दिगम्बर जैन तीर्थ स्थल सम्मेद शिखरजी के बाद सबसे ज्यादा पंचकल्याण प्रतिष्ठाओं वाला पवित्र स्थान है | इस अंचल को अतिशय क्षैत्र की मान्यता प्राप्त होना इसकी गौरवशाली परंम्परा में एक और कीर्ति पंख प्रस्थापित करती है |

 

वैसे तो ऐतिहासिक व सांस्कृतिक नगर लाडनूं में हिन्दू एवम् जैन मन्दिरों में अनेक पुरातात्विक महत्व की की मूर्तियां है | पर जैन संस्कृति का प्रमुख आस्था केन्द्र एक हजार वर्ष प्राचीन बड़ा जैन मन्दिर है | यह अपनी प्राचीनता, भव्यता व कलात्मकता के लिये विख्यात है जहां भक्तों व पर्यटकों का तांता लगा रहता है |

इस मन्दिर में श्री शांतिनाथ जिनालय नामक प्राचीन मूल मन्दिर सुशोभित है | उक्त मन्दिर जन श्रुति के अनुसार तलघर वाला मन्दिर कभी भूगर्भ में टीले के रुप में था, मिट्टी हटा कर प्रकाश में लाया गया जिसको जीर्णोद्धार कर सुरक्षित कर वृहद जिनालय का रुप दिया | इस प्राचीन मन्दिर के तलघर की मध्य वेदी में कलापूर्ण तोरण द्वार युक्त संगमरमर कि भव्य पद्मासन प्रतिमा प्रतिष्ठित है | यह प्रतिमा सोलहवें तीर्थकंर शान्तिनाथ जी की है - यही इस मन्दिर की मूल प्रतिमा है जो वि. सं. 1136 के समय की है | शांति और दया से आप्लावित शान्तिनाथ जी की उक्त प्रतिमा को आराधक चमत्कारी मूर्ति मानते है | मधुर मुस्कान दीप्त उनके मुख मण्डल के दर्शन कर एक अपूर्व प्रसन्नता का आभास होता है | इसकी प्रशान्त छवि आराध्य के प्रति आस्था, आराधना तथा समर्पण के भाव प्रकट करती है | इस बड़ा दिगम्बर जैन मन्दिर की कला का अवलोकन करें तो शान्तिनाथ जी की प्रतिमा वाला परिकर तोरण इसका उत्कृष्ट उदाहरण है | उज्जवल धवल संगमरमर पर निर्मित यह तोरणद्वार सूक्ष्म और सजीव कला की आकर्षक अभिव्यक्ति है | इसमें जैन कला की
सजीवता मुखरित हो उठी है | वेदी के ऊपर कलापूर्ण मण्डप छत पर अंकित बेल बूंटे, नक्काशी एवं विभिन्न मुद्राओं में चारों और सामूहिक नृत्य करते स्त्री-पुरुष स्वतः आकर्षित करते है | इसी तोरण द्वार की प्रतिकृति को कतिपथ परिर्वतन के साथ लाडनूं के आदिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर सुखदेव आश्रम में प्रतिष्ठापित किया गया है

इसी तलघर वाले मन्दिर में अवस्थित है बारहवीं सदी की जैन सरस्वती की विश्व विख्यात प्रतिमा | इस मूर्ति की भाव पूर्ण मोहक मुद्रा व कला संयोजन श्रेष्ठ है | श्वेत संगमरमर के एक बड़े पाषाण फलक पर उत्कीर्ण साढ़े तीन फुट ऊंची यह खड़गासन सरस्वती मूर्ति देश विदेश से आने वाले दर्शकों को आकर्षित करती है | अद्भुत सौन्दर्य व अलंकरण में निर्मलता व ओज का प्रभाव परिलक्षित होता है | सम्बधित कलाकार ने इसके अंकन में बड़ी सूक्ष्म दृष्टि का परिचय दिया है | कहते है 'कवि की जिह्वा में सरस्वती रहती है तो शिल्पी के हाथों में' और इसे ही चरितार्थ करती है विलक्षण आकार की यह उत्कृष्ट जैन कलाकृति | सरस्वती प्रतिमा के पास ही सोलह विध्या देवियों की मूर्तियां प्रतिष्ठित है |

मन्दिर के ऊपरी हाल में बड़ी वेदी को प्राचीन एवं कलात्मक मूर्तियों को आराधना भाव के साथ एक लघु संग्राहालय कहा जाय तो अतिशयोक्ति नही होगी | जैन धर्म के प्रथम तीर्थकंर भगवान ऋषभदेव की पद्मासन एवं ध्यानस्थ मूर्ति उत्कीर्ण वृक्ष की छाया में विराजमान है | 10 वीं शताब्दी की जिन प्रतिमा भी कला और आध्यात्मिक का मिश्रण है | इसी बड़ी वेदी में तेइसवें तीर्थकंर भगवान पार्श्वनाथ की दो प्राचीन खड़गासन मूर्तियां कला और आस्था का अद्भुता उदाहरण है | बाइसवें तीर्थकंर नेमीनाथ सहित पंच बालयति मूर्ति भी यहीं अवस्थित है | ऊपरी बड़ी वेदी में अष्ट धातु की चौबीस तीर्थकंरो की सम्मलित प्रतिमाओं का एक फलक है जो आध्यात्मिक और कला की दृष्टि से कफी महत्वपूर्ण है | इसके अतिरिक्ति इस मन्दिर में धातु की जिन लघु प्रतिमायें, पूजन पात्र, त्रितीर्थी धातु प्रतिमा, प्राचीन जिन प्रतिमायें काफी ऐतिहासिक महत्व रखती है |

प्राचीन मन्दिर से संलग्न शिखर युक्त मन्दिर की स्थापना को भी सौ वर्ष हो रहे है | जिन लोगों के सौजन्य से ये आस्था केन्द्र विकसित हुए वे तो सौभाग्यशाली हैं ही पर हम लोग जो इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी है, वे भी अपने संचित पुण्य के बल पर लाभार्थी हैं |

    

 

  

 

 

                                                                                                                                                                       

   

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